गठजोड़ से फल फूल रहा है संगठित अपराध

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शहडोल ज़िला नेताओं अधिकारियों और माफियाओं का सुरक्षित एव पसंदीदा चारागाह – शैलेन्द्र श्रीवास्तव

👉 गठजोड़ से फल फूल रहा है संगठित अपराध

दो दिन पहले अवैध उत्खनन में हुई दो मौतों के मामले में समाजसेवी एव युवा नेता शैलेन्द्र श्रीवास्तव ने तंज कसते हुए कहा है कि शहडोल जिले के लिये इससे बड़ी उपलब्धि और क्या हो सकती है कि यह ज़िला दशकों से नेताओं अधिकारियों और माफियाओं का सबसे सुरक्षित एव पसंदीदा चारागाह रहा है l भूतपूर्व पुलिस अधीक्षक अवधेश गोस्वामी और भूतपूर्व एसडीएम लोकेश जांगीड को छोड़ दे तो चाहे और कोई भी अधिकारी आये और कोई जाये यहाँ सब कुछ बदस्तूर जारी रहा l

कोयला कबाड़ रेत माफ़ियाओं की हमेशा से चाँदी रही l ना जाने सरकार की इनकम टैक्स, ED, सीबीआई, सीआईडी, लोकायुक्त और EOW जैसी एजेंसियों ने कौन सा ऐसा चश्मा पहन रखा है कि उनकी नज़र यहाँ के माफियाओं की अकूत सम्पत्तिओं पर नहीं पड़ती है l

तहसील से लेकर हर छोटे बड़े कार्यालय में बिना रिश्वत के कोई काम नहीं होता है l दशकों से एक ही जगह पर अंगद की तरह पैर जमाये हुये अधिकारी कर्मचारी भ्रष्टाचार की धुरी बन चुके हैं l राजनीतिक शून्यता के कारण नेताओं से लेकर अधिकारियों तक के लिये शहडोल सिर्फ़ एक सुरक्षित चारागाह बन चुका है l

दो दिन पहले सोहगपुर और बुढ़ार थानों के बीच धनगवाँ गाँव में अवैध कोयला खदान धसकने से दो लोगों की मौत हो गई l गाँव के लोग बताते हैं कि यहाँ से रोज़ाना लगभग पचास ट्रैक्टर अवैध कोयला निकलता है पर थानों में वर्षों से अंगद की तरह पैर जमाये हुये थाना प्रभारियों को इसकी भनक तक नहीं है l

मजे की बात है कि दो मौते हो जाने के बावजूद खनिज महकमे ने भी कोई नामजद प्रकरण दर्ज नहीं किया है क्योंकि हर बार की ही तरह जाँच अभी जारी है l पर इस बात की सराहना ज़रूर होनी चाहिए कि अवैध खदानों के गड्डे भरवाने का एहसान प्रशासन हर बार की तरह इस बार भी ज़रूर करेगा l हो सकता है कि ज़्यादा दबाव पड़े तो कुछ छोटी मछलियों के नाम पर प्रकरण दर्ज कर लिया जाये पर अवैध उत्खनन के मगरमच्छों तक अब क़ानून के हाथ नहीं पहुँचेंगे क्योंकि ये बात अब सिर्फ़ कहावतों में ही अच्छी लगती है कि क़ानून के हाथ बहुत लम्बे होते हैं l

ज़िले में फिर एक बार इतनी बड़ी घटना हो गई, पाँच मासूमों के सर से पिता का साया उठ गया, पर जनप्रतिनिधियों से लेकर क्षेत्र के तथाकथित नेताओं तक के कानों में जूँ तक नहीं रेंगी l रेंगें भी कैसे आख़िर सबकी अपनी अपनी कुछ मजबूरियाँ होंगी, ऐसे में ये कहना ग़लत नहीं होगा कि अपना काम बनता तो भाड़ में जाये जनता l

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